गुरुवार, 14 जुलाई 2011
मंगलवार, 5 अप्रैल 2011
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
मंगलवार, 2 नवंबर 2010
BHAI organised Global Bhojpuri Movement's meeting at Guwahati
The Sunday Indian, Bhojpuri, Bhojpuri association of
and Global Bhojpuri Movement had a very important meeting at Guwahati on 22nd of Oct. 2010. The meeting was called to strengthen Global movement for the recognition of Bhojpuri language in the 8th schedule of Indian Constitution. Chief Guest was Mr. Onkareshwar Pandey, Executive Editor of The Sunday Indian, and Executive Director of Bhojpuri Association of India (BHAI).
The meeting held at the premises of Kendriya Hindi Sansthan, Guwahati. Apart from the Director of the Sansthan, there were many Bhojpuri Intellectuals, Rajbhasha Adhikari, Educationists, Journalists and Editors were also present. Shri Ratnesh Kumar was the convenor of the whole meeting. The participants included some of the representatives of Bhojpuri Organizations also.
A new Chapter of BHAI will be open to Guwahati. Shri Ratnesh Kumar, a senior Journalist, promised to take initiative for completion of the formalities and declared that he will dedicate himself for this cause.
बुधवार, 8 सितंबर 2010
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
कबीर भोजपुरी के पहिला कवि
ओंकारेश्वर पांडेय
भोजपुरिया लोग कबीर के आपन पहिला कवि मानेले. हालांकि उनका से पहिलहूं भोजपुरी में साहित्य रचल गइल, बाकिर ऊ छिटपुट रहे. नाथसिद्ध साहित्यो में छिटपुट रूप से भोजपुरी मिलेला, बाकिर कबीर साहित्य त पूरा तरह से भोजपुरी से भरल बा.
पिछला साल 7 जून के दिल्ली से छपे वाला एगो दैनिक अखबार में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुडा के विज्ञापन छपल देखनीं. ई विज्ञापन कबीर जयंती पर रहे. विज्ञापन देख के मन में एक साथे दू गो विपरीत विचार उठल. पहिलका त ई कि एह बात के खुशी भइल कि चल कम से कम कवनो राज्य सरकार के याद त आइल कि कबीर नाम के कवनो अइसन संत साहित्यकारो रहन, जवन समाज के सुधार में आपन पूरा जिनगी गुजार देलन. दोसर ई कि दुनियाभर के भाईचारा के पाठ पढ़ावे वाला अइसन बड़ संत के भोजपुरिया क्षेत्र के नेता लोग भुला दीहल. ओह संत के जिनका के भोजपुरी के पहिला कवि मानल जाला. कबीर के याद ना त उत्तर प्रदेशे के सरकार के आइल अउर ना ही बिहारे सरकार के. एहिजा इहो बतावत उचित होई कि चलीं उत्तर प्रदेश सरकार रस्मीए तौर प सही बाकिर कम से कम उनकर जयंती प छुट्टी त क देला. बाकिर एगो बड़ भोजपुरी इलाका जवन बिहार में बा ओहिजा के सरकार के त कबीर कवनो हिंदी-भोजपुरी के महान संत-कवि रहन इहो याद ना आवे. एकरा से आज के राजनीतियो के पता चलेला, जेकरा में हर चीज के मुनाफा के हिसाब से देखल जाला. अउर कबीर एगो अइसन कवि रहन, जवन कि जात-पांत से लेके धर्म तक के खिलाफ रहन. अइसन में जात आ धर्म के खिलाफ खड़ा होखे वाला कबीर के याद कइल त उनके खातिर घातक हो जाई, उनकर भोट बैंक बिदक जाई. एह से साजिशनो कबीर के हाशिया प राखे के कोशिश कइल गइल. एकरा के कबीर के एह दोहा से समझल जा सकेला-
मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होइ रे
मैं कहता हूं आंखिन देखी
तू कहता कागद की लेखी,
मैं कहता सुरझावन हारी,
तू राख्यो अरूझाई रे.
खाली एह चंद पंक्ति में आज के राजनेता के चरित्र उजागर हो रहल बा कि कइसे ऊ लोग सब कुछ अझुरा के रखले बा. ऊ ना चाहस कि कवनो समस्या के समाधान होखे अउर इहे बात बा कि कबीर दर्शन के साहित्य में जेतना जगह मिलल, राजनीतिक जगत ओकरा से ओतने दूर रहल. काहे कि कबीर के वाणी हमेशा दुखिया लोगन के पक्ष में रहे. उनकर बिंबो दबल-कुचलल बुनकर, धोबी, बढ़ई, लुहार, गुलाम, महरा आ भिखारी जइसन जमात से आवेले.
ओइसे त कबीर के प्रासंगिकता सर्व-समाज में बा. बाकिर भोजपुरिया लोग कबीर के आपन पहिला कवि मानेले. हालांकि उनका से पहिलहूं भोजपुरी में साहित्य रचल गइल, बाकिर ऊ छिटपुट रहे. नाथसिद्ध साहित्यो में छिटपुट रूप से भोजपुरी मिलेला, बाकिर कबीर साहित्य त पूरा तरह से भोजपुरी से भरल बा. कबीर जनकवि रहलें. दार्शनिक रहन. दबल-कुचलल समाज के आवाज रहलें. ऊ आपन जमाना के तमाम तरह के पोंगापंथ प प्रहार करे से ना चूकलन. बाकिर ऊ पोंगापंथ खाली ओही जमाना के ना रहे, आजुओ चारों ओर लउकेला-
माला फेरत जुग गाया, मिटा ना मन का फेर.
कर का मन का छाडि़, के मन का मनका फेर..
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उनका बारे में बड़ नीमन बात कहले बाड़े, ''जवन लोग कबीरदास के हिंदू-मुस्लिम धर्म के सर्व-समन्वयकारी मानेले ऊ का कहेले ठीक से बुझाला ना. कबीर के रास्ता एकदम साफ रहे. ऊ दूनों के रास्ता स्वीकार करे वाला में ना रहन. ऊ मय बाह्यïाचार के जंजाल आ संस्कार के विध्वंस करे वाला क्रांतिकारी रहन. समझौता उनकर रास्ता ना रहे. एतना बड़ जंजाल के ना करे के क्षमता कवनो मामूली आदमी में नइखे हो सकत. कमजोर स्नायु के आदमी एतना भार बरदाश्त नइखे क सकत. जेकरा आपन मिशन प अखंड विश्वास ना होखे, ऊ एतना साहसी नइखे हो सकत.
अइसन कबीर के आज के घोर अराजकता के युग में बहुते महत्व बा. एकरा से इनकार नइखे कइल जा सकत. आज के युग के आडंबर के बतावत उनकर एह पंक्ति के देखीं-
जो नर बकरी खात है, ताको कौन हवाल
पर अब नर ही नर को खात है, बुरा धरती का हाल !
अउर इहे वजह बा कि आज छव सौ बरिस से तमाम आंदोलन के नायक बन के कबीर खड़ा बाडऩ. अरुण कमल के शब्दन में, ''कबीर के कविता हमार आह्वïान करेले कि उठ एकरा बदल. ई खाली संत के वाणी नइखे, कबीर सामूहिक कर्म के आह्वïान करेले. एकर आह्वïान ऊ आपन पंक्ति में कइलहूं बाड़े- 'कहत कबीर सुनो भई साधो.
आज के युग में कबीर के प्रासंगिकता के देखत एह बात के शिद्दत से महसूस कइल जात रहे कि कबीर के विचार के देश आ दुनिया में फइलावल जाव. कबीर के जाने-माने वाला हर लोग के भीतर एह बात के लेके एगो उद्वेलन रहे. भारत में रहे वाला एक करोड़ से जादे कबीरपंथी अउर दुनिया भर में फइलल कबीर के भक्तन के भीतरो एकरा लेके बेचैनी रहे. एकरे मद्देनजर कबीर विचारधारा प आधारित एगो सैटेलाइट टेलीविजन चैनल शुरू होखे जा रहल बा. कबीर पंथ के आगे बढ़ावे वाला वाराणसी के लहरतारा स्थित कबीर मंदिर मूलगढ़ी अब संत कबीर के विचारन के आम आदमी तक पहुंचावे के तैयारी क रहल बा. उनका विचार प आधारित टीवी चैनल लावे जा रहल बा. मूलगढ़ी के प्रमुख आचार्य विवेक दास बतइले, ''हमनी के सेटेलाइट चैनल शुरू करे जा रहल बानी जा. एकरा खातिर दिल्ली के मदनगीर स्थित कबीर भवन में अत्याधुनिक स्टूडियो के निर्माण चल रहल बा, जवन आखिरी दौर में बा.
ऊ कहले, ''हमनी के उद्देश्य संत कबीर के वैश्विक भाइचारा के संदेश के दुनियाभर के लोगन तक पहुंचावल बा. ऊ भरोसा जतइले, ''कबीर के अगिला जयंती तक एह चैनल के ऑन एयर क दीहल जाई. चैनल के नाम अबहीं तय नइखे भइल. ई चैनल पूरा तरह से कबीर दर्शन प आधारित होई.
एतने ना कबीर के विचारधारा के फइलावे खातिर मीडिया के अन्य माध्यमो के सहयोग लीहल लीहल जा रहल बा। अबकी कबीर जयंती के अवसर प उनका प बनल चार गो फिलिम कैलिफोर्निया के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कबीर उत्सव के दौरान देखावल जा रहल बा. कबीर के दर्शन प आधारित फिलिम बनावे वाली चलो हमारे देस नाम फिलिम के निर्देशिका शबनम विरमानी आपन फिलिम के माध्यम से दुनिया भर में कबीर के विचार फइला रहल बाड़ी. एगो बातचीत में ऊ कहली, ''हमहीं एगो नइखीं, जवन देश-दुनिया में कबीर के विचारधारा के आगे बढ़ा रहल बानी. हमरा जइसन कई लोग एकरा में लागल बा. सिनेमा एगो माध्यम त बड़ले बा, बाकिर मालवा के दलित समाज के प्रहलाद सिंह टिपनया उत्तर भारत में कबीर के आवाज लोगन तक पहुंचा रहल बाडऩ, ऊ जादे बड़ काम बा. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफे सर लिंडा हेसो कबीर में लीन बाड़ी.
कबीर के खोज में निकलल फिलिम निर्देशिका विरमानी लिंडा हेसो के एह यात्रा के अहम कड़ी मानेली. उनकर वाराणसी में गुजरल दिन आ स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में आज के काम, दूनों कबीर से जुड़ल बा.
बाकिर कवनो आदमी संगे सबसे बड़ विसंगति ई होला कि ऊ जवन चीज के जिनगी भर विरोध कइलस ओकरे से ओकरा जोड़ दीहल जाव. कबीर जीवन भर धर्म आ जाति के विरोध में खड़ा रहले, ऊ कहले-
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़
ताते वह चाकी भली पीस खस संसार
कांकर पाथर जोरि के मसजिद लेई चुनाय
ता चढि़ मुल्ला बांग दे बहिराहुआ खोदाय
या फेर उनकर एह दोहा के देखीं-
मसजिद भीतर मुल्ला पुकारै,
क्या जाने है तेरा साहब कैसा है ?
चिंऊँटी के पग नेवर बाजे,
सो भी साहब सुनता है
पंडित होय के आसन मारै
लंबी माला जपता है
अन्तर तेरे कपट कतरनी
सो भी साहब लखता है
कबीर जीवन भर धर्म के विरोध कइले, बाकिर उनकर पूजा शुरू हो गइल. उनकर अनुयायी उनका भगवान बना देले. उनकर मंदिर बन गइल. आज हमनी के उनकर साहित्य के भुला के , उनकर पोंगापंथ के खिलाफ आग उगलत शब्दन के उपेक्षा क के उनके भगवान बना देले बानी जा. ओइसहीं एह पंक्ति के देखीं-
पूरब जनम हम ब्राह्मïण होते, वोछे करम तप हींना
रामदेव की सेवा चूका, पकरि जुलाहा कीन्हां
याने ऊ आपन पूरा जीवन जात-पांत के विरोध में लगा देले अउर हमनी के कबीर के साहित्य अउर उनकर दर्शन प बात करे से जादे एह बात के संधान करे में लागल बानी जा कि ऊ जुलाहा रहन कि ना, ऊ मुसलमान रहन कि हिंदू. एकरा से बड़ विसंगति कबीर के साथे अउर कवनो दूसर नइखे हो सकत. कबीर के एह जयंती प उनका सबसे बड़ श्रद्धांजलि इहे होई कि-
माया महाठगिनी के हम जानी
तिरगुन फांस लिए कर डोलै बोलै मधुर वाणी
माया महाठगिनी के मोह से निकल के हमनी के कबीर के एगो कविए-दार्शनिक रहे दी जां, उनका भगवान ना बनाईं जा.
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
विश्व फलक प भोजपुरी पत्रकारिता
http://www.thesundayindian.com/26102008/default.asp
http://www.thesundayindian.com/26102008/default.asp
http://www.thesundayindian.com/26102008/default.aspद संडे इंडियन के साथे भोजपुरी पत्रकारिता के गौरवपूर्ण सफर के दू साल पूरा हो गइल. एह सुनहरा सफर के मील के पत्थरन प अक्षर-अक्षर नज़र
दुनिया में भोजपुरी भासा के पहिला नियमित राष्ट्रीय समाचार पत्रिका द संडे इंडियन के दू साल पूरा हो गइल. मार्च 2008 में एह पत्रिका के प्रकाशन मैनेजमेंट गुरू प्रो. अरिंदम चौधरी के नेतृत्व वाला प्लानमैन मीडिया समूह के बैनर से भइल त एगो इतिहास रचा गइल. ई द संडे इंडियन के पहिले से निकलत 13 भासा के संस्करण में खाली एगो आउर भासे ना जोड़लस, बलुक दुनिया भर के भोजपुरिया लोगन के उन्हकर भासा में निकले वाला पहिला राष्ट्रीय समाचार पत्रिका बन गइल. अइसे त भोजपुरी पत्रकारिता के पुरान इतिहास रहल बा. बाकिर हाल के दिन में भोजपुरी फिलिमन आ टीवी चैनल के अइला के बाद एह पत्रिका के आवे से सांचहूं में भोजपुरी के स्वर्णिम युग के शुरुआत हो गइल. अब ई पत्रिका भोजपुरी जगत के जानल पहचानल नाम हे गइल बा. भोजपुरी भासा के आंदोलन के प्रखर अगुआ के भूमिको ई निभा रहल बा. पिछला दू साल में एह पत्रिका के कइएक गो संग्रहणीय अंक निकललीस. बाकिर एइजा हमनी के भोजपुरी के आपन पाठक लोग आ शोधार्थी–विद्यार्थी लोगन खाती एह पत्रिका में पिछिला दू साल में छपल सामग्री के सार संक्षेप दे रहल बानी जा. –
- कार्यकारी संपादक, द संडे इंडियन, हिंदी आ भोजपुरी
Best regards,
Onkareshwar Pandey
Executive Editor, The Sunday Indian (Hindi & Bhojpuri)
World's only News Weekly in 14 languages
http://www.thesundayindian.com/26102008/default.asp
Office—0120—4170139 (D) Email - editoronkar@gmail.com
Former Resident Editor--RASHTRIYA SAHARA (Hindi Daliy), Delhi & Patna
Executive President of BROADCASTERS CLUB OF INDIA www.broadcastersclubofindia.org
Executive Director, ASIA Region, Bhojpuri Association of India (BHAI)www.BhojpuriIndia.org
Member, Advisory Committee, Bhojpuri Adhyayan Samiti, BHU, Varanasi
Founder, Global Movement for Bhojpuri
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
महाराष्ट्र, पंजाब, असम आदि राज्यों के बाद अब तमिलनाडु में बिहारी छात्रों पर कहर
महाराष्ट्र, पंजाब, असम आदि राज्यों के बाद
अब तमिलनाडु में बिहारी छात्रों पर कहर
तमिलनाडु के कुड्डालोर स्थित अन्नामलाई विश्वविद्यालय में कल रात पुलिस लाठीचार्ज के बाद से इंजीनियरिंग के दो बिहारी छात्रों के नहर में मृत पाए जाने से परिसर में तनाव पैदा हो गया है। किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए विश्वविद्यालय परिसर और अस्पताल में बडी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।झारखंड के एक छात्र की सडक दुर्घटना में मौत के बाद विश्विद्यालय परिसर में हिंसा फैल गई थी। उत्तर भारत के लगभग 300 छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर छात्र के इलाज के लिए उचित सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाने का आरोप लगाते हुए राजा मुथैया अस्पताल में मरीजों पर हमला कर दिया था।
पुलिस लाठीचार्ज के दौरान भागते समय एक छात्र नहर में गिरकर डूब गया। इसे देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने इंजीनियरिंग की कक्षाओं को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया और छात्रों को छोड देने की मांग की।बाद में दो छात्रों के लापता होने की जानकारी मिली और अग्निशमनकर्मियों की ओर से उन्हें ढूंढने के लिए चलाए गए अभियान के दौरान नहर से दो शव बरामद हुए। मृतकों की पहचान आशीष रंजन कुमार (20) और एम सुब्रत राज (20) के रुप में की गई है। शवों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल में भेज दिया गया है और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए विश्वविद्यालय परिसर और अस्पताल में बडी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।
तमिलनाडु के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करने गए बिहार के दो छात्रों की मौत की सूचना के बाद उनके परिजनों को बिहार सरकार ने डेढ़-डेढ़ लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तमिलनाडु में पढ़ाई कर रहे बिहारी छात्रों की सुरक्षा के लिए वहां के मुख्यमंत्री से बात भी की है। मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अधिकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री ने तमिलनाडु में पढ़ाई करने गए दो छात्रों की मौत के बाद उनके परिजनों को डेढ़-डेढ़ लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया है। अधिकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री ने वहां के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि से बात कर वहां पढ़ाई कर रहे बिहारी छात्रों की सुरक्षा देने को भी कहा है। राज्य के गृह सचिव आमिर सुबहानी ने मंगलवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि रविवार को तमिलनाडु के कडलूर जिले के अन्नामलाई विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे दो बिहारी छात्रों की उस समय मौत हो गई थी जब पुलिस और छात्रों के बीच हुए टकराव में मची भगदड़ में कुछ छात्र कॉलेज के नजदीक नहर में डूब गए थे। नहर में डूबने के कारण बिहार के दो छात्रों की मौत हो गई थी। उन्होंने बताया कि वहां के गृह सचिव से बात हुई है तथा शवों को लाने के लिए दोनों छात्रों के अभिभावक पटना से रवाना हो गए हैं। उन्होंने अधिकारियों की टीम भेजे जाने की बात पर कहा कि वहां के छात्रों को सुरक्षा दिलवाना मुख्य कार्य है अगर जरूरत पड़ी तो अधिकारियों को भी भेजा जाएगा।
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(एकरा पहिले चेन्नई के वेल्स यूनिवर्सिटी में पढ़ रहल बिहार, झारखंड आ यूपी के उत्तर भारतीय छात्रन के छात्रावास में बंद क के स्थानीय छात्र दू दिन तक लगातार लाठी डंडा से पिटाई करे के समाचार आ चुकल बा. एहिजा मैनेजमेंट आ इंजीनियरिंग के छात्रन के बीच क्रिकेट मैच के लेके भइल विवाद के बाद छात्रन के पिटाई शुरू भइल रहे. बिहार के गृह सचिव आमिर सुबहानी एह मामला प तमिलनाडु के गृह सचिव से बात क के छात्रन के सुरक्षा के अपील कइले रहन.
पिछला सितंबर महीना में तमिल मजदूर बिहार के मजदूरन पर कहर बरपइले रहल स. एकरा में बिहार के तकरीबन दस मेहनतकश घायल हो गइल रहन. एकरा से बिहार के वैशाली जिला के गोरौल थानान्तर्गत छितरौली के मूल निवासी 45 कामगार दहशत में रहन. तब युवा जनता दल के वैशाली जिलाध्यक्ष एह प्रकरण में हस्तक्षेप खाती मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चिट्ठी लिखले रहन.)
BHOJPURIA WORLD: GLOBAL BHOJPURI MOVEMENT
मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010
GLOBAL BHOJPURI MOVEMENT

Mahatma Gandhi had started his Satyagrah Movement from Bhojpuri area West Champaran. The first President of India Dr. Rajendra Prasad was a Bhojpuri speaking person. The present Loksabha speaker of India Mrs. Meira Kumar is a known Bhojpuria woman. Bhojpuri speaking leaders have become Presidents, Prime Ministers not only in India, but in some other countries as well. Bhojpuri produces 8 out of 10 Top Hindi writers. It has its Language, Literature, Script, Art, Culture, Music, Film and all other things which are necessary to get the recognition for any language. Then why this should not be recognized in India and in other countries where it has a sizeable population?
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Onkareshwar Pandey
Executive Editor,
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गुरुवार, 12 मार्च 2009
हजार साल पुरान भासा के दरद
सब हथियारन छोड़ हाथ में रखिह लाठी
भोजपुरी भासा के एह इमेज बनावे के पीछे के कहानी बता रहल बाड़न ओंकारेश्वर पाण्डेय
हजार साल पुरान भासा के दरद
(ई आलेख द संडे इंडियन के ताजा अंक में छपल बा.)
सब हथियारन छोड़ हाथ में रखिह लाठी - लिंगुइस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भोजपुरी के अध्याय के शुरुआत विद्वान अंगरेज अधिकारी आ भासा वैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज ए. ग्रियर्सन एही लाइन से कइले बाड़े. भोजपुरिया इलाका में प्रचलित गिरधर के ई कुंडली भोजपुरियन के वीर आ साहसी होखे के प्रमाण रहल बा. एह लाइन के साथे-साथे ग्रियर्सन इहो कहले बाड़े कि हिन्दुस्तान में नवजागरण के श्रेय मुख्य रुप से बंगाली आ भोजपुरिया लोगन के जाला. बंगाली लोग जवन काम कलम से कइले उहे काम भोजपुरिया अपना लाठी से कइले. ग्रियर्सन के एही बात में छुपल बा भोजपुरिया लोग के उपेक्षा, अनदेखी, अवहेलना आ अपमान के लंबा दास्तान. ग्रियर्सन भारत में अंगरेजी हुकूमत के हाकिम रहलन. विद्वान आ दूरदर्शी त रहबे कइलन. उनकर कहे के मतलब साफ रहे. बंगाली लोग त कलम चला चला के आजादी के आंदोलन के पक्ष में हवा बनावत रहन. बाकिर ठेंठ भोजपुरिया आपन लाठी उठा के अंगरेजन के मारि भगावे लगले. बाबू कुंअर सिंह से लेके मंगल पांडेय तक के विद्रोह के कहानी जन जन के जुबान प बा. गुजरात से आके महात्मा गांधी आपन सत्याग्रह आंदोलन के शुरुआत करे खाती बिहार के भोजपुरिया इलाका चंपारण के धरती असहीं ना चुनले रहन. लाठी के एह माटी में भरल आग के अंदाज उनका बढ़िया रहे.
बाबू कुंअर सिंह के नेतृत्व में अंगरेजन के खिलाफ भइल भोजपुरियन के लड़ाई के बारे में बाबू तोफा राय लिखले बाड़े-
खप्प करि असि घुसे लोथि गिरे भूमि धप्प
गोरा सिक्ख कटत देखि आयर दहलल नू
भूखल बाघ अस वीर भोजपुरी दल
पड़ल ललकारत हर बम्म बम्म करत नू
त एही से ग्रियर्सन भोजपुरिया लोग के लाठी के चर्चा कइले बाडे़. बाकिर इहो सोचल जाव कि का एकरा बहाने भोजपुरियन के पहचान आ इमेज एगो लड़ाकू जाति के बनावे के ना रहल हा ? याद करीं बिहार में लालू यादव के लाठी रैला. आ सोचीं कि का एही कुल्ह से भोजपुरिया आ बिहारी लोग के देस भर में इमेज ना खराब कइल गइल ?
इलाहाबाद में नेहरू खानदान के आनंद भवन के आज भलहीं भोजपुरिया इलाका में माने ना माने प तनी मतांतर होखे, बाकिर ओह घड़ी त ई भोजपुरिया नगर स्वतंत्रता आंदोलन के नेता लोगन के राजनीतिक केन्द्र रहल. याने समूचा भोजपुरी इलाका दहकत रहे.
त का ई मानल गलत होई कि अंगरेज एकर बदला लेवे खातिर भोजपुरिया लोगन के एक प्रांत में ना रहे देलन ?
भोजपुरियन के ई लाठी देस के आजादी त दियवलस, बाकिर ओकर बहुत बड़ कीमत एह समाज के चुकावे के पड़ल. हजारन साल पुरान भासा, जवन मुगल काल से लेके अंगरेजन के शासनकाल तक सरकारी कामकाज के भासा रहल, जवना के संख्या हिंदी के बाद भारत में सबसे जादे बा, जेकर लिपि कबहूं देवनागरी से जादे लोकप्रिय आ मान्यता प्राप्त सरकारी लिपि रहल बिया, जवना में गोरखनाथ आ कबीर से लेके भिखारी ठाकुर-महेन्दर मिसिर से आज तक हजारन साहित्यकार भइले -जवन भासा के फिलिम हिंदी के बाद सबसे जादे लोकप्रिय बड़ुवे, जवना में कइगो टीवी चैनल आ अब पत्रिको छपत होखे ओह भासा के संविधान के अठवों अनुसूची में जगह ना मिले, त एकरा पीछे कवनो बात जरूर बा.
सवाल ई बा कि का भोजपुरी के आजादी के आंदोलन में अगुआ बने के सजाय मिल रहल बा ? ना त केहू बतावे ना कि काहे अतना देर एही भासा खाती भाई?
भोजपुरी समाज, दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दूबे एह भासा के मान्यता मिले में देरी से दुखी बाड़े, बाकिर दिल्ली में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के एह बात खाती सराहेले कि ऊ कम से कम मैथिली भोजपुरी मिलाइये के एकेडमी त बनवा दीहली.बाकिर बिहार आ उत्तर प्रदेश में एकरा प राज्य सरकारन के ध्यान नइखे. देश के आठ गो विश्वविद्यालय में जब बीए, एमए से लेके पीएचडी तक लोग एह भासा में कर रहल बाड़े त इग्नू के याद आइल कि एकर फांउंडेशन कोर्स बनावल जाव.
ई काहे भुला देल गइल कि भोजपुरी माटी के सदल मिश्र देस के ओह चार लेखकन में रहन जेकरा हिंदी में पहिला साहित्य लिखे के जिमवारी देल गइल रहे ? काहे लोग भुला गइल कि एही भोजपुरी माटी में पाणिनी-पातंजल संस्कृत भासा के व्याकरण के रचना कइलन ? वरिष्ठ भोजपुरी लेखक गिरिजा शंकर राय गिरिजेश के कहनाम बा कि भोजपुरी के उपेक्षा एह माटी से पैदा होखे वाला नामी लेखक लोग कइलस. भोजपुरी पत्रिका पाती के संपादक डॉ. अशोक द्विवेदी
असल में भोजपुरी माटी के विद्वान लेखक आ साहित्यकार लोग पहिले संस्कृत आ फेर देस के भासा बनावे के व्यापक राष्ट्रहित खातिर हिंदी के अपनवले आ भोजपुरी के बलि चढ़ा दीहले. ई बलिदान हिंदी क्षेत्र के अलावा कवनो भासा के लोग ना कइलस.
आजादी के बाद जब राज्यन के बंटवारा भासा के नाम प भइल तबहूं भोजपुरी के भासा के आधार प प्रांत ना देवे के पीछे बांटो और राज्य करो के अंगरेजी मानसिकता शायद रहल बिया. आ तबहूं एह इलाका के नेता लोग राजनीति ना बूझले. अरे भाई आपन प्रांत आ भासा लेहला के बादे जब दोसर लोग अपना के भारतीय कहिंहें त खाली भोजपुरिये लोग काहें आपन भासा आ प्रांत छोड़ के चार राज्य में बंटल भारतीय रहिंहें.
द संडे इंडियन एह भासा के मान्यता दियवावे खातिर अभियान छेड़ले बा. पिछला साल भर से एह पत्रिका के जरिये हमनी के इहे बतावे के प्रयास कर रहल बानी जा कि भोजपुरी कवनो दोसर भासा के तुलना में कतहूं कम नइखे.
भोजपुरी एगो टकसाली भासा ह.जइसन लाठी मजबूत ओइसने भासा. चले लागी त अंधाधुंध. एही से विद्वान लोग एह भासा के व्याकरण के उलझन से उन्मु्क्त मनले बा. भोजपुरिया लोग के सुभावो अइसने होला. अपना प गर्व करे वाला. जिला भोजपुर ह भारत के सिंगार बबुआ. आ ओसहीं निडर -आरा जिला घर बा त कवन बात के डर बा.
भोजपुरी भासा के इतिहास हजारन साल पुरान बा. ई एगो अइसन भासा ह जवना के फइलाव आज भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ से लेके दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, गुवाहाटी ही ना बलुक देश के कोना कोना में बसल पुरबिया लोगन के बीच बा.
धरती पटल पर 4-5 महाद्वीपन में फैलल भोजपुरी करीब 20 करोड़ लोगन के मातृभासा ह. विश्व के भासवन में जापानी आ जर्मन के बाद एकर 10वां स्थान होई. भारत में त हिंदी के बाद ई दोसर सबसे बड़ भाषा बड़ले बिया. एकरा अलावा नेपाल, मॉरीशस, त्रिनिडाड, फिजी, सूरीनाम, नीदरलैंड्स, फ्रेंच गुयाना, केन्या आ कैरेबियाई देशन के अलावा रूस, अमेरिका, ब्रिटेन आ आन देशन में भोजपुरा के पताका लहरा रहल बिया. एकरा में अतना दम खम बा कि एकरा के संयु्क्त ऱाष्ट्र में भी मान्यता मिल सकेला. पर केहू माने के मांग करे तब नू. आखिर अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दुनिया भर के सय गो भासा में भोजपुरी के शामिल क के एकर जानकार लोगन के अपना भासा विभाग में रखे के फैसला अइसहीं त ना नू कइले होइहें.
भारत के अतना महत्त्वपूर्ण भासा भोजपुरी के उपेक्षा खाती एह इलाका के राजनेता लोग कम जिमवार नइखन. ऱाष्ट्रपति से लेके एगो ना कइएक गो प्रधानमंत्री तक ई माटी देहलस. लालू यादव से लेके आजो ढेर नेता इहे भोजपुरी बोल के राजनीति में आपन खूंटा गड़ले बाड़न. बाकिर लानत बा एह लोगन प कि भोजपुरी आपन जायज मान सम्मान आ पहिचान खातिर टुकुर टुकुर राह ताक तिया.
जवन भासा उत्तर-मध्य आ पूर्वी भारत, बिहार के पश्चिमी भाग, झारखंड के उत्तरी-पश्चिमी भाग आ उत्तर-प्रदेश के पूर्वांचले में ना बलुक भारत के लगभग सभी नगर महानगर में बोलल जाले.
वास्तव में देखल जाए त भोजपुरिये भारत के पिहल भासा बिया जे अपना मातृभूमि भारत के साथे साथ लगभग आधा दरजन अउर देशन में अपना भाषाई सामर्थ्य आ बोले वाला लोगन के संख्या बल प स्वीकृत आ मान्य होखे के माद्दा रखत बिया. भारत आ नेपाल के अलावा भोजपुरी विश्व के अन्य देश जइसे गुआना, सूरीनाम, फीजी, त्रिनीदाद, टोबैगो, मॉरीशस आदि में बड़ पैमाना प बोलल आ बूझल जाला.
विश्वभर में भोजपुरी भासी लोगन के सही संख्या के अधिकृत रुप से ज्ञान नइखे. एगो बात इहो बा कि अधिकांश भोजपुरी भाषी लोग अपनी मातृभासा के रूप में हिंदी या उर्दू लिखेलन, जे भारत सरकार के जनगणना रिपोर्ट से साबित हो जाई.
पिछिला एक साल से सुन तानी कि भारत सरकार एह प्रक्रिया में बिया कि भारतीय संविधान के 8वां अनुसूची में एकरा के शामिल क के संवैधानिक दरजा दियाई. बाकिर चुनाव के घोसणा हो गइल, भोजपुरी के वादा एह सरकार के इयाद ना आइल. नेपाल के माओवादी सरकार के विदेशमंत्री उपेन्द्र यादव मूल रुप से बिहारे के हवन. ऊ वादा कइले बाड़े कि नेपालो में भोजपुरी, मैथिली आ अवधी के संवैधानिक मान्यता देहल जाई.
यह सत्य है की भोजपुरी दिन पर दिन निखरती और विस्तारित होती जा रही है। बालीवुड में हिंदी के बाद भोजपुरी फिल्मों का ही स्थान है। ये फिल्में भारतीय फिल्म-जगत में बुलंदी और एक सशक्त स्थान पर विराजमान हैं। भोजपुरी टीबी चैनल करोड़ो दर्शकों पर अपना जादू बिखेरकर उनके दिलों पर राज कर रहे हैं। आज बिना किसी सरकारी सहायता के भोजपुरी की पहली राष्ट्रीय समाचार पत्रिका 'द संडे इंडियन' की माँग बहुत ही बढ़ी है और यह पत्रिका अपनी सटीक और यथार्थ प्रस्तुति के कारण लाखों प्रबुद्ध भोजपुरी पाठकों और आलोचकों द्वारा भी सराही जा रही है।
परंतु अब समय आ गया है जब हम एक होकर इस नारे के साथ भोजपुरी को मजबूत करें, इसे इसका सही स्थान दिलवाएँ-
हिंदी हमार आन ह
त भोजपुरी पहचान ह
(अगर हिंदी हमनी जन के आन हS तS भोजपुरी असली पहिचान हS)
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009
For the recognition of BHOJPURI as International Language
LET’S OBSERVE
International Mother Language Day
For the recognition of BHOJPURI
as International Language
Bhojpuri, the language of 84 million people as mother tongue spread over four / five Continents of the Earth places it at the 10th position after Japanese and German among world languages.
It’s the second largest among Indian languages after Hindi. When Govt. would recognize Bhojpuri?
February 21 is observed as International Mother Language Day globally, commemorating those who had sacrificed their lives on this day in Dhaka in 1952, asserting their right to speak Bangla.
The Sunday Indian in association with Bhojpuri Association of India (BHAI) is observing this day for the recognition of Bhojpuri language.
We urge the governments of India, Nepal, Guyana, Suriname, Fiji, Trinidad and Tobago and Mauritius to give constitutional recognition and rights for the proper development of Bhojpuri language in their countries.
We also urge United Nations Secretary General and the head of UNESCO to constitute a high level committee for the survey of Bhojpuri speaking people all over the world. We would also request to make a separate department for the development of this International Language in UNESCO.
I would like to thank the US President Barak H. Obama for the inclusion of Bhojpuri and other Indian languages in the list for the US Govts Job.
Mother tongue or Mother Language, after all, is not necessarily the language spoken by one’s mother but the one in which a person is at home from childhood. it does sometimes lead to confusion and bring forth hybrid languages, like hinglish which is threatening to take over North India.
But Politics, Economics & Media have become inextricably tangled with the growth and spread of languages. A few eventually win out while many others are eliminated in the battle for survival. Tribal languages are naturally the worst sufferers in all continents. In India, tribals have to learn the state language, and their own languages or dialects die slowly.
The languages are also being affected by the process of Economic liberlisation and Globalisation. It is hastening the death of many minor languages which may prove to be increasingly useless for money-making purposes.
New generations would find it wasteful to learn them and shall latch on to the dominant one or two languages in every country.
Today, according to a report, world’s 6,000 languages are under threat. And the worst offenders are America and Australia where hundreds of aboriginal languages have died out. Hundreds are on the decline in Asia and Africa while in Europe, about 50 are in danger. Will Bhojpuri also be included in that list after a span of time? It may be the fate of this language too if not recognized, preserved and promoted seriously now.
The increasing pressure from world’s dominant languages like English, French, German, Russian, Spanish and also the mainstream Chinese are threatening the existence of many small or undeveloped languages.
Two dialects — mita and ksarwar — were found in west Bengal which were then spoken by just one person each during the l961 census. In the fastnesses of Arunachal Pradesh, there was a dialect comprising a total of 25 words, more than which was not found to be necessary by those people, who were living in primitive conditions with very limited demands, and not unhappily at that.
How is a language superior to a dialect? “a language is a dialect that has an army and a navy”, said max weinreich. However, the big fish will eat the small fish, and languages which cannot dominate will lose out in the course of time. Russell Hoban had offered consolation, “after all, when you come right down to it, how many people speak the same language when they speak the same language?”
Bhojpuri is a very significant regional language of India, which is spoken not just in parts of north-central and eastern India, western part of state of Bihar, the northwestern part of Jharkhand, and the Purvanchal region of Uttar Pradesh. But it is also spoken in almost all Metro Cities in India, as well as in adjoining area of southern plains of Nepal.
In fact Bhojpuri is the first Indian language which has got the speakers population and language potential to get the recognition in half a dozen of countries apart from its mother land India.
Apart from India & Nepal, Bhojpuri is also spoken in Guyana, Suriname, Fiji, Trinidad and Tobago and Mauritius.
The exact number of Bhojpuri speaking people in the world is not known. The fact is most of the Bhojpuri speaking people write Hindi or Urdu as their mother language. This is evident in the census report of the Govt. of India.
Now the government of India is in the process to grant it statutory status as a national scheduled language under 8th schedule of Indian constitution.
The new Govt. of Nepal has also promised to give constitutional recognition to Bhojpuri, Maithili and Awadhi in Nepal.
The fact is Bhojpuri language is shining day by day. Bhojpuri films are rocking Bollywood after Hindi Cinema. Bhojpuri TV Channels are capturing the minds of crores of viewers. The first Bhojpuri national news magazine THE SUNDAY INDIAN is in great demand. And all without any help from the Govt.
But now this is the time to raise hands with clear and loud slogans….
HINDI HAMRI AAN BA
BHOJPURI PAHICHAN BA…
The Background: ================================
The International Mother Language Day was introduced by the UNESCO in recognition of the sanctity and preservation of all vernacular languages in the world. The event began being observed from 21 February 2000 throughout the world to commemorate the martyrs who sacrificed their lives on this date in dhaka in 1952.
The background to the proclamation of the International Mother Language Day was a proposal from Bangladesh at the UNESCO General Conference in Paris on 17 November 1999 to declare 21 February as an international day on the ground that on this day many had sacrificed their lives for their mother tongue.
It was argued that, since the languages of the world are at the very heart of UNESCO's objectives and since they are the most powerful instruments for preserving and developing the tangible and intangible heritage of nations and nationalities, the recognition of this day would serve not only to encourage linguistic diversity and multilingual education but also to develop a fuller awareness of linguistic and cultural traditions throughout the world and to inspire international solidarity based on understanding, tolerance and dialogue. The Paris Conference was convinced that one of the most effective ways to promote and develop mother tongues was the establishment of an International Mother Language Day throughout the world with a view to organising various activities in the member states and a language exhibition at UNESCO Headquarters on the same day.
The day the Conference chose for the purpose was 21 February. This was, indeed, in appreciation and recognition of the unprecedented sacrifice made by the Bangla speaking people of Bangladesh for the cause of their mother tongue (matribhasa) on 21 February 1952. The Paris meet also put on record how solemnly the people of Bangladesh have been observing the day as Martyrs' Day (shaheed dibash) ever since 1952, and how the People's Republic of Bangladesh has been observing the day as a special national day since its emergence as an independent state in 1971.





























